मंगलवार, 17 अगस्त 2010

इतिहासकार को सच को उस समय के संदर्भों में पकडना चाहिए - रामशरण शर्मा से कुमार मुकुल की बातचीत

आजकल ज्‍योतिषशास्‍त्र और बायोटेक्‍नालॉजी की पढाई की बात हो रही है...वैदिक गणित की चर्चा है...इस पर आप क्‍या कहेंगे...

हां नये लोग हैं,नये ढंग से विचार कर रहे हैं। ये बताते हैं कि सब वेदों में है। तो अब आगे पढने-पढाने की क्‍या जरूरत है...यूपी से वैदिक मैथेमेटिक्‍स पर एक किताब निकाली गई है। जो वहां कोर्स में चलाई जा रही है। मैंने गणितज्ञ गुणाकर मूले से वह किताब पढवाई थी। उन्‍होंने बताया कि वैदिक गणित की सामग्री कैम्ब्रि‍ज के एक गणितज्ञ के यहां से उतारी हुई है।

देखिए,हडप्‍पा में घोडा नही था सांड थे। उनलोगों ने सांड को घोडा कहा। जबकि घोडा लेट हडप्‍पा संस्‍कृति में मिलता है। उस समय हाथी या गैंडा था। यह शब्‍द गण-गंडक से निकलता है। पहले लिखा जाता था कि भगवन बुद्ध गैंडे की तरह चलते थे। दरअसल इतिहासकार को सच को उस समय के संदर्भों में पकडना चाहिए।
सच पर बात हो सकती है। पर आप सांड को घोडा कहें तो दिक्‍कत होगी। इसी तरह गाय का मामला है। पहली बार महात्‍मा बुद्ध ने कहा था कि गाय को नहीं मारना चाहिए। इसका बडा फायदा है। फिर आगे ब्राह्मणों ने भी कहा कि गाय को नहीं मारना चाहिए। पर ब्राह्मणों ने यह भी जोडा कि गाय के साथ ब्राह्मण को भी नहीं मारना चाहिए। आगे गाया की हत्‍या रूकी तो खेती बढी। इस विचार का लाभ मिला लोगों को। पर आज ट्रैक्‍टर आदि के आने के बाद बैल बेकार साबित हो रहे हैं। हाल में ही दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के वाइस चांसलर ने लिखा है कि आज गाय पालना हानिकारक है।

आप मार्क्‍सवादी इतिहासकार हैं। आज भारत में मार्क्‍सवाद और वादी पिछड क्‍यों गये हैं...

अब मार्क्‍सवादी भी एक्‍शन-इंटरेक्‍शन के प्रासेस को नहीं पकड पाते। उन्‍हें आर्थिक के साथ सामाजिक स्थितियों का भी ध्‍यान रखना चाहिए। आर्थिक कारण हैं चीजों के। इस आर्थिक कारण से जो चीजें पैदा होती हैं। इसका फिर क्‍या प्रभाव पडता है...। इसपर ध्‍यान ही नहीं है।

विचारधारा और इतिहास के अंत की घोषणाएं हो रही हैं आज। फुकियामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की है। आप इस पर क्‍या सोचते हैं...।

विचारधारा का प्रभाव जबरदस्‍त पडता है। यह धर्मांधता को हटाती है। पर ब्राह्मणों ने तो हमारे लोगों का दिमाग बदल दिया है। फुकोयामा ने जो कहा है , ठीक ही कहा है - भाजपा वाले और फुकोयामा मिल जाएंगे और दोनों मिलकर सब का अंत कर देंगे। हमारे पीएम इरान जाते हैं तो वहां इस्‍लाम के योगदान पर बोल आते हैं और यहां कुछ और होता है। वह जो कहावत है न - जब जइसन तब तइसन...। इसी पर चलते हैं ये। उनका कोई हिडेन एजेंडा नहीं है। वे सुखदेव और भगतसिंह को देशद्रोही कहते रहे हैं।

आजकल आप इतिहास के अलावा क्‍या पढ रहे हैं...इधर कुछ नया लिखा है...

कुछ नहीं पढ रहा। बस सुबह-शाम टहलता हूं। पुरानी किताबें फिर से छपी हैं। इधर अर्ली मिडिआइवल इंडियन सोसायटी ए स्‍टडी इन फ्यूडेलाइजेशन छपी है नयी। इसकी कीमत छ सौ है। पेपरबैक छपेगी तो सस्‍ती होगी। अब इस उमर में कुछ करना पार नहीं लगता।इतिहास पर काम के अलावे दूसरा कोई काम नहीं। मेरा सिद्धांत है - एके साधे सब सधे,सब साधे सब जाए।

बिहार की आज की स्थिति के बारे में क्‍या सोचते हैं आप...

पटना के बुद्धिजीवि पढते-लिखते हैं। यहां अखबार,साप्‍ताहिक खूब बिकते हैं। बिहार सरकार को उच्‍च शिक्षा पर ध्‍यान देना चाहिए। 1977 में जब मेरी किताब पर वैन लगी थी तब मैंने जवाब में एक पुस्तिका,सोशल चेंज इन इंडिया, लिखी थी। कर्पूरी ठाकुर इस किताब को बराबर जेब में रखते थे।

बातचीत का यह अंश 2001 में पटना से निकलने वाले पाक्षिक न्‍यूज ब्रेक में छपा था।

मंगलवार, 30 मार्च 2010

नथिंग इज गुड और बैड-राजेन्‍द्र यादव:बातचीत-कुमार मुकुल


आपके मनोविज्ञान को किन लेखकों ने प्रभावित किया?

रवीन्द्रनाथ टैगोर, एंटोन चेखव, टाल्सटाय, दोस्तोएवस्की और सीमोन द बोउवार जैसे लेखकों ने मेरे मन पर प्रभाव डाला। ये ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मनुष्य के मनोजगत में गहरे उतरकर देखा है। किसी विशेष स्थिति में चेखव पात्रों का जिस गहराई और प्रामाणिकता से चित्रण करते हैं, वह चकित करता है-पात्र चाहे साधु संत हो या लंपट, वे दोनों के मन में समान गहराई से उतरते हैं। जब किसी पात्रा का चित्रण करते हैं तो लगता है कि चेखव खुद उन परिस्थितियों से गुजरे हों। दोस्तोएवस्की ने अपने पात्रों के मनोविज्ञान व मानसिक उठापटक और अंतर्मन में चलते द्वंद्वों का जैसा चित्रण किया है वैसा दुनिया के किसी कथाकार ने नहीं किया है। खुद फ्रायड ने दोस्तोएवस्की पर किताब लिखकर उनके मनोविज्ञान से अपने सिद्धांतों का निर्माण किया। दोस्तोएवस्की की पुस्तक अपराध और दंड को अमेरिका में अपराध शास्त्रा को समझने के लिए पाठ्यक्रमों में लगाया गया है। मुझे उनका उपन्यास डबल प्रिय है जिसमें मानसिक दबावों और तनावों में जीनेवाला नायक खुद अपने प्रतिरूप को सामने पाता है और उससे संवाद करता है और पाठक भूल जाता है कि असली नायक कौन है। मनोविज्ञान की इस गहराई तक शायद ही कोई दूसरा लेखक पहुंचा हो। टैगोर-शरतचंद्र में स्त्री मनोविज्ञान को पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। उन्नीसवीं सदी के सभी बडे कथाकारों ने बेहद प्रामाणिकता से नारी मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश की है। उनमें फ्लाबेयर, बाल्जाक, आदि मुख्य हैं। सीमोन की सेकंड सेक्स तो नारी मनोविज्ञान की गीता मानी जाती है। उसने स्त्रियों की सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक कई पक्षों का गहराई से चित्राण किया है। नारी होने के कारण यह उसके लिए सहज भी था।

आपके जीवन की किन घटनाओं ने आपको विचलित किया?

मुश्किल है याद करना...। सब जुड़ी हैं...। मेरे एक घनिष्ठ मित्र की तनावपूर्ण परिवारिक जीवन की यातनाओं से गुजरने की घटना ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया। उसी पर मैंने सारा आकाश उपन्यास लिखा। उनका नाम था रामप्रकाश दीक्षित। हाल की एक घटना बहुत महत्त्वपूर्ण है। मेरा एक परिचित युवक अपने मित्र की पत्नी के प्रेम में इस तरह पड़ा कि उसे कुछ सूझता ही नहीं था। पर जब उसी महिला ने एक और मित्रा पर नजरे-इनायत की तो उस युवक को गहरा धक्का लगा और वह घंटों रोता रहा कि जिसके पीछे उसने अपनी जिंदगी के पंद्रह साल खराब किए वह उसे दगा दे गई। वह आत्महत्या करने की सोचने लगा था। यह घटना मुझे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण लगती है। इस पर गहराई से लिखने का मन होता है।

मनोवेद जैसी पत्रिका में आप क्या चाहते हैं?

हर बार कुछ नये मनोवैज्ञानिक केसेज सामने लाए पत्रिका।

मन ही मनुष्य है' मनोवेद का यह स्लोगन कैसा है ?

ठीक है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। अंग्रेजी कहावत भी है-देयर इज नथिंग गुड और बैड, बट थिंकिंग मेक्स इट सो...।

‘‘मनोविज्ञान की समझ आम लोगों तक साहित्य के माध्यम से ही जाती है’’ - विष्‍णु नागर


चर्चित कवि-कथाकार विष्णु नागर से कुमार मुकुल की बातचीत

आप कवि के साथ समर्थ व्यंग्यकार भी हैं, व्यंग्य की रचना-प्रक्रिया क्या कविता से अलग है?
कविता हो या व्यंग्य रचना-प्रक्रिया तो एक ही है। जिस तरह कविता दिमाग में आती है उसी तरह व्यंग्य भी आता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ पता नहीं चलता कि यह रचना क्या रूप ले रही है। कब वह कविता से कहानी बनने लगती है, इसका अंदाज नहीं हो पाता, हालांकि अब ऐसा अक्सर नहीं होता है। कई बार रचना पूरी होने पर ही स्थिति साफ होती है कि वह क्या बनी। कई बार व्यंग्य लिखना चाहता हूं और वह कुछ और हो जाता है - उसमें कटुता ज्यादा आ जाती है या वह व्यंग्य से अधिक व्यक्ति के मर्म को अधिक छूने वाली रचना बन जाती है पर प्रक्रिया एक ही होती है। व्यंग्य चूंकि आजकल रोज लिखना होता है तो अभ्यास होने से एक आसानी होने लगती है पर कविता उस आसानी से नहीं आती। कभी आई नहीं।

सारा साहित्य एक मनोविज्ञान को सामने लाता है, तो साहित्यकार किस हद तक मनोविज्ञानी है? क्या इस रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है?
बिल्कुल किया जा सकता है। मनोविज्ञानी आमतौर पर रचनात्मक नहीं होतेे और वे मनोविज्ञान को कुछ फार्मूलों के तहत ज्यादा समझना चाहते हैं। आदमी उनके सामने होने पर भी उसके मन में उतरने की बजाय वे अपने सीमित टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह वे सामने वाले को एक आॅब्जेक्ट के रूप में देखने लगते हैं - फलतः आप उसके मनोविज्ञान को समझ कर भी नहीं समझ पाते। लेखक के लिए आदमी आॅब्ज्ेाक्ट नहीं होता - उसे उसका इस्तेमाल नहीं करना होता है - उसे वह जीवन की सहज प्रक्रिया के दौरान ही जानता-समझता है। मनोविज्ञान की समझ उसकी आम लोगों तक किसी-न-किसी किस्म के साहित्य के माध्यम से की जाती है। हमारी दुनिया के बड़े लेखकों ने भले मनोविज्ञान की पढ़ाई न की हो, पर उनसे बड़े मनोवैज्ञानिक कम ही हैं, जैसे - चेखव, प्रेमचंद आदि।

एक रचनाकार अपने रचना-कर्म से असंतुष्ट भी रहता है और उससे मोह भी रहता है। इस द्वंद्व के साथ उसे कैसे तालमेल बैठाना चाहिए?
कोई भी रचनाकार मेरे खयाल से कभी अपनी रचना से संतुष्ट नहीं होता। उसे उसकी रचना के और अपने अधूरेपन का अहसास हमेशा रहता है। रचनाकार का कोई एवरेस्ट शिखर नहीं होता, जहाँ वह झंडा फहरा आए। लेकिन जो रचा है, उसे सबके सामने लाने की इच्छा भी रहती है ताकि दूसरों की आँख से भी उसे जाँचा-परखा जा सके। इस द्वंद्व के साथ ही कोई भी रचनाकार जीता है।

आप ‘भटकते रहने में’ विश्वास करते हैं। इसके पीछे आपकी सोच क्या है?
मैं इसके शाब्दिक अर्थ में भी यानी सड़क पर भटकने में भी विश्वास रखता हूं और एक रचनाकार के रूप में भटकते रहने में भी। भटकने की आदत के चलते मुझे आपने आसपास के तमाम रास्तों का पता रहता है और नए रास्ते मिलते रहते हैं। एक रचनाकार के रूप में क्यों हम अपनी एक खास छवि ही प्रक्षेपित करने पर जोर दें? जो आपका मन करे, जैसे करे, वैसा उस रूप में लिखा जाए फिर उसे कोई मान्यता दे या ना दे। यह दूसरों की स्वतंत्राता है कि वे उसे रचना के रूप में माने या न माने और यह रचनाकार की स्वतंत्राता है कि वह लिखे और संभव हो तो प्रकाशित कराए। मेरा विश्वास है कि छवियोें में बंद होना अपनी रचनात्मकता को खत्म करना है।

माँ पर आपकी कई कविताएँ हैं। माँ को लेकर अपनी यादों से कुछ बाँटना चाहेंगे?मैंने अपने पिता को अपनी स्मृति में देखा नहीं। मैं अपने परिवार में अपनी माँ के अलावा अकेला था। तो माँ ने ही मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। उसी से मैं लड़ता भी रहा और प्यार भी करता रहा, पाता रहा। मेरी एक इच्छा पूरी नहीं हो पाई कि मैं उनके जीते जी उन्हें कुछ भौतिक सुख प्रदान कर पाता। यह दुख मुझे सालता है। उनका जीवन आर्थिक तंगी और उसके तनावों में ही बीता।

अन्य बीमारियों के उलट मनोरोग को भारतीय समाज एक कलंक मानता है। इस प्रवृत्ति को कैसे बदला जाए?
हमारे समाज में चिकित्सा की इतनी कम सुविधाएं रही हैं कि लोग शरीर के इलाज के अलावा मानसिक इलाज के बारे में जानते ही नहीं ? आदमी के पागल हो जाने के बाद ही यह सोचा जाता है कि उसे किसी मनोचिकित्सक को दिखाना है, कि वह समाज के किसी काम का नहीं, कि उसे पागलखाने में भर्ती कराना है। सदियों से गहरे में बैठी इस मानसिकता का नतीजा है कि जागरूक लोग भी मानसिक बेचैनियों की स्थिति में किसी मनोचिकित्सक के पास जाने से हिचकते हैं। इस प्रवृत्ति से लड़ना होगा क्योंकि अपनी कई मानसिक परेशानियों का निदान न होने पर आदमी कई बार अचानक हिंसक हो उठता है, आत्महंता हो जाता है या पागल हो जाता है। अपनी भूमिका को मीडिया कुछ हद तक निभा रहा है पर वह पर्याप्त नहीं है।

मनोवेद में और कौन-सी नई सामग्री आप चाहेंगे?चाहे वह भले ही सीधे मनोविज्ञान से न जुड़ी हो पर जिसका रवैया रचनात्मक हो तो उसका इस्तेमाल इसमें होना चाहिए। गिजुभाई जैसे बाल मनोविज्ञान के जानकार लेखकों की सामग्री को हिन्दी में मनोवेग जैसी पत्रिकाओं को उपलब्ध कराना चाहिए। वैसी सामग्री जो किसी भी रूप में लोगों के मनोविज्ञान को सामने लाती हो, चाहे वह ऊपर से मनोवैज्ञानिक न लगती हों उसका इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए।

‘मन ही मनुष्य है’ इस उक्ति को आप कहां तक उचित मानते हैं?उक्तियों के उलझाव में मैं जाना नहीं चाहता। ये ऊपर से आकर्षक होती हैं पर कई बार पूरी सच्चाई को सामने नहीं आने देतीं। मानव इतना जटिल जीव है कि वह खुद भी नहीं जानता कि वह क्या है - रोज-रोज उसके सामने उसका अपना रहस्योद्घाटन होता रहता है। कई बार बुरे अर्थों में और कई बार बहुत अच्छे अर्थों में। मेरा खयाल है कि जो अपने व्यवहार का और समाज का भी लगातार विश्लेषण और आत्म विस्तार करता रहता है वही एक बेहतर मनुष्य हो पाता है। ऐसा करने के लिए आपके पास कई तरह के मानवीय-सांस्कृतिक औजार होने चाहिए क्योंकि जब आप अपनी क्षमता से बड़ी चुनौती के आगे खड़े होते हैं तब भी आपकी समझ में आता है कि आप कहां हैं, क्या हैं। हालांकि आज का हमारा संसार बहुत ही आत्मतुष्ट किस्म के लोगों का संसार है। और उन्हें अपनी हर छोटी-मोटी उपलब्धि पर गर्व है।

किन रचनाकारों ने आपके मनोविज्ञान पर प्रभाव डाला?किसी एक का नाम लेना सरलीकरण होगा। फिर भी जिनका नाम याद आ रहा है, वे हैं - तालस्ताय, चेखव, ब्रेख्त, प्रेमचंद, रघुवीर सहाय और कुछ हद तक जैनेंद्र। असंख्य रचनाकार हैं जिन्होंने तरह-तरह से प्रभावित किया है। एक आदमी मात्रा लिखित रचना से ही प्रभावित नहीं होता। रचनात्मकता के अलिखित रूप भी उसे प्रभावित करते हैं। मसलन संगीत, भारतीय शास्त्राीय संगीत ने गहरे से मथा है मुझे। कई बार लगता है कि संगीत से बड़ी कोई रचना शब्दों में नहीं की जा सकती।

कुछ घटनाएं, जिन्होंने आपको विचलित किया हो?
रोज ही कुछ न कुछ विचलित करता है पर जो आपके साथ घटित होता है तो आदमी उससे ज्यादा विचलित होता है। जैसे - भोपाल गैस हादसे का मैं शिकार होते-होते बचा क्योंकि - हादसे के एकाध घंटे पहले मैं भोपाल से निकल गया था जबकि मेरा इरादा उसी रेलवे स्टेशन पर सोने का था। बाद में हादसे की भयानकता का अंदाजा लगा तो जीवित होतेे हुए भी कई दिनों तक या शायद महीनों तक खुद को मरा हुआ ही समझता रहा। इस हादसे के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से निकलने में सालों लगे पर उस पर एक लाइन नहीं लिख पाया मैं, यह भी दिलचस्प है। जबकि मैं बाद में नवभारत टाइम्स के लिए कवरेज करने के लिए गया भी था। एक सप्ताह वहां रहा। आज भी भोपाल शहर को मैं बहुत पसंद करता हूं। वहां बार-बार जाने की इच्छा होती है।

मनोवेद से

ग्‍लोबलाइजेशन चीजों को टुकडों में देखता है - प्रभाष जोशी

बातचीत - 1997 प्रभात खबर
राष्‍ट्रीय पुनरनिर्माण के मुद्दों पर बहस में भाग लेने आए लोगों में वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी अन्‍य वक्‍ताओं के साथ अनुग्रहनारायण संस्‍थान की अतिथिशाला में ठहरे थे। सुबह नौ बजे मैं पहूंचा तो कमरे में आसा के एकाध लडके थे। बेड पर उनकी चौडे पाढ वाली धोती खोलकर रखी थी। उसी पर एक कलफ चढा खादी का कुरता भी। तभी बाथरूम का दरवाजा खुला,जोशी जी ने पुकारा कि यार,यहां तो पानी ही नहीं आ रहा, बुलबुले फूट रहे हैं। तभी सुरेन्‍द्र किशोर आए। उन्‍होंने आसा के व्‍यवस्‍थापकों को सलाह दी कि आगे से जोशी जी को कम से कम ऐसी जगह ठहराएं जहां फोन हो। एक कर्मचारी नीचे से बाल्‍टी में गर्म पानी लेकर आया। उसने आग्रह किया कि बाल्‍टी जल्‍द खाली कर दें,क्‍योंकि कभी भी किसी वीआईपी का फोन आ सकता है- कि कमरा तैयार करो। सुरेन्‍द्र जी ने पूछा कि कैसे वीआईपी तो उसने बताया, कोई आईएएस या वाइसचांसलर।
जोशी जी नहा कर निकले...। यार सुरेन्‍द्र अपन को तो यहां बहुत कष्‍ट हुआ। लगता है कि बहुत दिन से यह बाथरूम यूज नहीं हुआ था। सब साफ करना पडा। आधा घंटे और इंतजार करवाउंगा अपन। मेरा धोती पहनना पूरा कर्मकांड ही है। मेरी बेटी कहती है कि आप तो बंगाली स्त्रियों से भी अच्‍छी धोती बांधते हैं, फिर उन्‍होंने बिसलरी की बोतल से पानी पिया। सुरेन्‍द्र जी ने परिचय कराया कि इन्‍हें समय चाहिए इंटरव्‍यू के लिए। जोशी जी ने पूछा, तो आप मेरा आंत्रव्‍यू लेंगे,जी हां - साक्षात्‍कार। शाम का समय मिला।

शाम में हमलोग बैठे घंटे भर विनयन व शेखर से बात करने में गुजरे। फुर्सत मिली तो जोशी जी बोले,यार बात तो होगी ,पहले कहीं से यह पता करो कि क्रिकेट का स्‍कोर क्‍या है..। आखिर स्‍कोर मालूम हुआ।
पहला सवाल मेरे मन में यह था कि उत्‍तरआ‍धुनिकता-अंग्रेजी की वापसी और ग्‍लोबलाईजेशन से हिंदी पत्रकारिता कैसे निपटेगी...।

उनका कहना था कि भारत में उत्‍तरआ‍धुनिकता नहीं है,हमारा समाज आधुनिक है,यह कहना भी मुश्किल है। हिंदी पत्रकारिता के सामने संकट तो है,पटने में 12 पेज के अखबार ढाई रूपये में मिलते हैं और दिल्‍ली में 24 पेज के अखबार डेढ रूपये में। पर डेढ में बेचकर भी उन्‍हें करोडों की कमाई हो जाती है। इसका कारण है ग्‍लोबलाइजेशन व विज्ञापन। यह 1991 के बाद की आर्थिक स्थिति का नतीजा है। ग्‍लोबलाइजेशन समाज को टुकडों में बांट कर देखता है।
भाषा के अखबार जनता के अखबार हैं, पर उनका हितसाधक समाज टुकडों में बंटा है। इसे राजनीति और व्‍यापार ने मिलकर बांटा है। आज लालू,मुलायम,नीतीश वोट बैंक की राजनीति करते हैं। मुलायम ने कहा था कि मुझे उत्‍तराखंड की चिंता नहीं है। आखिर एक मुख्‍यमंत्री एक पूरे इलाके को छोड देता है कि वह उसका बोट बैंक नहीं है। फिर भी भाषा के अखबार जनता के होकर ही जीवित रह सकते हैं। पर इसे बांटने वाली प्रवृति को रोकना होगा1 इधर प्रमंडल का अखबार निकालने का चलन बढा है। यही नहीं आजजागरण वाले तो जिले का अखबार निकालने लगे हैं। इसी से समाज बंटता है। पर अखबार मालिकों के इशारे पर चल रहे हैं, वे बताते हैं कि- इधर देश के सबसे बडे प्रकाशन गृह के अध्‍यक्ष ने मुझसे कहा कि इन, जिले वाले अखबार, में क्‍या खराबी है...। खर्च कम है ,लागत भी कम।

सौंदर्य प्रतियोगिता के विरोध में एक आदमी जल मरा। आरक्षण के विरोध में भी ऐसा हुआ था। पर महिला आरक्षण का मुददा गायब कर दिया गया।
इस सब की बाबत वे बताते हैं कि 1996 के चुनाव में सारी पर्टियों के घोषणापत्र में 33 फीसदी आरक्षण की बात थी। पर उसे टाला जा रहा है। महिलाओं का दबाव बढ रहा है। पर मौजूदा लोकसभा के अधिकांश सदस्‍य ऐसा नहीं चाहते।

इधर शिवसेना व वाघेला तक ने क्षेत्रीय दलों का साथ चाहा है। क्‍या राष्‍ट्रीय दलों का जमाना लद गया है...।
इस पर जोशी जी बताते हैं कि आज कोई दल राष्‍ट्रीय रह ही नहीं गया है।,उत्‍तर के कई राज्‍यों में कांग्रेस का नामलेवा नहीं रह गया है। यहां एक ही पार्टी थी कांग्रेस,उसकी जगह क्षेत्रीय पार्टियां ले रही हैं। पर ये सीमित क्षेत्र की बंटी पार्टियां हैं। भाजपा और क्षेत्रीय पर्टियां साथ काम करें तो कोई सूरत उभरे पर वह संभव नहीं लगती।

अचानक मेरा ध्‍यान घाली पर जाता है। कया यूएनओ एक अमेरिकी जेबी संस्‍था है...। घाली के मुददे पर अमेरिका ने वीटो कर दिया। इराक के मामले में तो राष्‍ट्रसंघ ने युद्ध की स्‍वीकृति दी पर अफगान मामले में ढंग से निंदा भी नहीं की..।

इससे सहमत होते जोशी जी कहते हैं कि सोवियत संघ के पराभव के बाद अफगानिस्‍तान तबाही में है। एक लाख लोग वहां मारे जा चुके हैं। अमेरिका ने पाकिस्‍तान को अफगानिस्‍तान में फंसाकर रख दिया है। पर पाक का अपना ही घर नहीं संभल रहा । जहां तक यूएनओ की बात है अमेरिका हमेशा से इसका प्रयोग विश्‍व जनमत को अपनी ओर मोडने में करता रहा है।

मैं फिर पत्रकारिता पर आता हूं। इधर राजेंद्र यादव ने अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्‍दी की तुलना कर उसकी फजीहत की कोशिश की है। क्‍या यह हिंदी की हीनता ग्रंथी है...।

इस तरह की तुलना को जोशी जी गलत मानते हैं। ...हीनता से बचने के लिए नहीं,परंपरा को समृद्ध करने के लिए हमें ऐसी तुलना से बचना चाहिए। हमारी भाषाई पत्रकारिता अंग्रेजी से समृद्ध है। अक्‍सर लोग अंग्रेजी से तुलना हिन्‍दी को झाडू लगाने के लिए करते हैं। अंग्रेजी की पत्रकारिता आज उल्‍टे बांस बरेली को भेज रही है। अंग्रेजी का अनुकरण कर हिंदी के अखबार कभी अच्‍छे नहीं हो सकते।
कुछ लोग क्षेत्रीय भाषायी पत्रकारिता को हिन्‍दी से समृद्ध बताते हैं...

जवाब में वे कहते हैं कि यह हिन्‍दी की अंग्रेजी से हीनता जैसी ही ग्रंथी है। यूं भाषायी पत्रकारिता ही हिंदी की जननी है। भारतीय पत्रकारिता की शुरूआत ही बंगाल से हुई है। जोशी आजकल गांधी को फिर से पढ रहे हैं। उनका मानना है कि साम्‍यवाद के पराभव व पूंजीवाद की विकृतियों के बीच का रास्‍ता गांधी से ही निकलेगा। यह हो सकता है कि हमें गांधी की पगडंडी चौडी कर राजपथ बनना पडे। क्‍योंकि पूंजीवाद की टेक्‍नोलाजी अपनाने से ही साम्‍यवाद में केंद्रीकरण की प्रवृति बढी व वह टूटा। महाभारत को भी वे पढने की सलाह देते हैं,कि मधुलिमये भी उसे पढते थे। उन्‍होंने आलोक धन्‍वा के लिए भी सलाह दी कि वे महाभारत पढें,उनका पराजय बोध घटेगा।
महाभारत की विशेषता है कि वहां न कोई हारता है न जीतता है। सबका विजय-पराजय दोनों से साबका पडता है। यह हिंदू धर्म की विशेषता है कि इसने तमाम अवातारों को सजा दी है। राम-कृष्‍ण-ब्रम्‍हा सब को ब्रम्‍हांड के न्‍याय के आगे सिर झुकाना पडा है।
अंतिम सवाल वरिष्‍ठ पत्रकार हेमंत करते हैं जो अभी अभी वहां आए हैं। वे पूछते हैं कि नये पत्रकारों को तैयार करने के लिए आप क्‍या कर रहे हैं...

उनका जवाब था कि प्रेस इंस्‍टीच्‍यूट के जरिए हमलोग नयी पीढी को पत्रकारिता के मूल्‍यों से परिचित कराने की सोच रहे हैं। नयी पीढी से अक्‍सर मुझे निराशा मिलती है। वे राजनीतिक तिकडमों को प‍त्रकारिता मानते हैं।
एक सवाल और उठता है कि हिंदी में कालमिस्‍ट नहीं हैं...।
उनका मानना है कि आज ज्‍यादातर अखबार अंग्रेजी के कालमिस्‍टों का अनुवाद छापते हैं ऐसे में क्‍या कहा जा सकता है। आज जागरणउजाला जैसे अखबार नकद पैसे देकर लेक्‍चररों से संपादकीय लिखवा ले रहे हैं । वार्ता और भाषा को जोशी जी अंग्रेजी की उपशाखाएं मानते हैं। वे बोलते हैं कि आज हमें भाषाई समाचार सेवा शुरू करने की जरूरत है।